http://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js काग़ज़ की छत और कपड़े की दीवार में सिमित है परिवार का आशियाना – India News Live

काग़ज़ की छत और कपड़े की दीवार में सिमित है परिवार का आशियाना

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बालूमाथ:- एक तरफ जहाँ हम झारखण्ड निर्माण के 17 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, वहीँ दूसरी तरफ राज्य सरकार के द्वारा इस औसर को उत्सव के रूप में मानाने के साथ साथ आवासहीनों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्मित घरों में गृह प्रवेश पूरे धूमधाम से कराया जा रहा है। वहीँ इस जश्न और उत्सव के बीच कुछ ऐसे गरीब भी हैं जो महीनों से कागज़ के छत और प्लास्टिक से दीवार घेरकर पूरे परिवार के साथ रहने के लिए विवश व मजबूर हैं। ऐसा ही एक परिवार है प्रखंड के बसिया पंचायत के जर्री गांव की हासरतिया खातून का। जिसका मिटटी का खपरैल जर्जर घर इस बरसात में धंसकर जमींदोज हो गया था। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की गिरे हुए घर की मरम्मत कारवा सके।घर का गिरना तो मानिये कि इस गरीब परिवार के सामने संकट का पहाड़ खड़ा होना था। पति मो अली जूता दुकान में काम कर परिवार का किसी तरह भरण पोषण कर पा रहा था, कि यह नयी मुसीबत सामने आ खड़ी हो गई। कुछ दिन तक पति व दो बच्चों के साथ गांव में रिश्तेदार के घर शरण लेने को विवश परिवार ने जमींदोज हुए घर का मलबा हटाकर प्लास्टिक और बोरे से घेरकर रहना शुरू किया। बांस और बल्लियों के सहारे खड़ी दीवार को कार्टून के सहारे छत का आकार दे दिया। मासूम दो बच्चों के साथ पति पत्नी इसी अस्थायी आवास में स्थाई रूप से रहने लगे। हद तो यह हो गई की बार बार गुहार लगाने के बाद भी सरकार की किसी योजना का कोई लाभ इस आवासहीन गरीब परिवार को नहीं मिला। हासरतिया खातून बताती हैं कि घर गिरने के बाद मुआवजे के लिए 31अगस्त को अंचल अधिकारी बालूमाथ को आवेदन दी थी। महीनों बीत जाने के बाद भी कोई सहायता नहीं मिली। परिवार के सामने बच्चों को ठण्ड से बचाना एक चुनौती है, जो इस काग़ज़, प्लास्टिक और बोरे के घेरे में मुमकिन नहीं है। अब देखना यह है कि इस परिवार पर सरकार की कृपादृष्टि कब बनती है और परिवार को आवास की सुविधा कब मिलती है।

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