http://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js आगे-आगे नेताजी, पीछे-पीछे ‘वंदे मातरम’ लिए रिपोर्टर.. फिर टेस्ट में सब फेल हुए- वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की कलम से – India News Live

आगे-आगे नेताजी, पीछे-पीछे ‘वंदे मातरम’ लिए रिपोर्टर.. फिर टेस्ट में सब फेल हुए- वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की कलम से

मुझे अंदाजा था कि चैनलों के रिपोर्टर माइक लेकर निकलेंगे. अलग-अलग शहरों में बीजेपी नेताओं-पार्षदों को पकड़ेंगे. वंदे मातरम गाने को कहेंगे. सब फेल हो जाएंगे. आखिरकार वही हुआ. अभी मैं ‘आजतक‘ पर मध्यप्रदेश और राजस्थान के दर्जनों पार्षदों और लोकल नेताओं के देशभक्ति टेस्ट के नतीजे देख रहा था. कोटा, उदयपुर, जयपुर, ग्वालियर, जबलपुर… जहां-जहां कैमरा घूमा, वहां-वहां नेताओं के सिर घूमे. किसी से वंदे मातरम गाया न गया. कोई दो शब्द सुना पाया. कोई चार शब्द. इससे आगे शायद ही कोई बढ़ पाया. हां, फेल होने के पहले बोल सब रहे थे कि वंदे मातरम सबको गाना चाहिए. सबके लिए जरुरी होना चाहिए. हर नगर निगम के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए. इतने के बाद जब उन्हें वंदे मातरम गाने को कहा गया तो सबकी पोल ऐसी खुली कि कई दिनों तक अपने मोहल्ले वालों के सामने भी पड़ेगे तो शर्म आएगी. अगर कहीं होगी तब. भाई जिस वंदे मातरम के लिए इतना बवाल काट रहे हो, पहले खुद तो याद कर लो. मैं पहले भी कह चुका हूं. फिर कह रहा हूं कि देश के किसी भी हिस्से में कैमरे की जद आने वाले नेताओं में से ज्यादातर वंदे मातरम गा ही नहीं सकते. वैसे ही फेल होंगे, जैसे ये हुए हैं. तो अब ऐसे इम्तेहानों में अपने नेताओं को फेल होने से बचाने के लिए पार्टी को मुकम्मल इंतजाम करने की जरुरत है. मैने अपनी पिछली पोस्ट में भी कुछ रास्ते सुझाए थे. वही फिर सुझा दे रहा हूं. बचना है तो गाना सीखो.

मेरे हिसाब से अब पार्टी को अपने ऐसे नेताओं को न्यूज चैनल पर डिबेट में भेजने से पहले उनका देशभक्ति टेस्ट करा लेना चाहिए. उनसे राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान सुनकर टेस्ट कर लेना चाहिए कि वो डिबेट में जाने लायक हैं कि नहीं. आए दिन वंदे मातरम और देशभक्ति पर होने वाले डिबेट में कौन – कब – कहां टेस्ट लेने लगे, कहा नहीं जा सकता. भाई जब आप खुद को देशभक्ति विश्वविद्यालय के टॉपर मानकर दूसरों को अपने विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए घसीटते फिरेंगे तो कहीं कोई आपका भी तो टेस्ट ले ही सकता है न. ऐसा न हो कि आप बिहार की रुबी कुमारी की तरह खुद ही फेल डिवीडन हों, पीछे के दरवाजे से डिस्टिंशन लेकर लेक्चर झाड़ रहे हों. तो इसके लिए जरुरी है कि पार्टी की तरफ से देश भर में पाठशालाएं लगाई जाएं. पार्टी के जिला और राज्य मुख्यालयों में ऐसी पाठशालाओं का इंतजाम हो. केन्द्रीय पर्यवेक्षक की मौजूदगी हो ताकि वंदे मातरम कंठस्थ कराने की इस मुहिम में कोई पिछला दरवाजा न हो. फिर लिस्ट बन जाए कि इन्हें पूरा याद हो पाया. इन्हें आधा याद हो पाया. इस आधार पर मार्किंग करके नेताओं की रेंकिंग तय हो जाए. इससे टीवी चैनलों में डिबेट के लिए अपने नेताओं को भेजने वाली मीडिया टीम को भी सहूलियत होगी. जिस भी डिबेट में देशभक्त का दरवाजा खुलने की थोड़ी भी गुंजाइश हो, वहां कम रेंकिंग वालों को न भेजा जाए. देश भर में फैले लाठीमार दस्ते के लिए नियम थोड़े और सख्त हों ताकि अगली बार वो वंदे मातरम के लिए लाठी लेकर निकलें तो एक बार अपनी मेमोरी चिप जरुर चेक करे लें. और हां, जो सरे आम देशभक्ति साबित करने के इस इ्म्तेहान में फेल हों, उनके लिए कड़ी सजा मुकर्रर हो.

मैं स्कूल के दिनों में वंदे मातरम और जन-गण -मण भीड़ का हिस्सा बनकर गाया करता था. जन-गण-मन आसान है. याद हो गया. वंदे मातरम चार शब्द के बाद याद नही हो पाया. थोड़ा कठिन भी है. सुनने में बहुत कर्णप्रिय है, इसमें कोई शक नहीं. बड़े -बड़े गायकों ने और गायक मंडली ने गाया है. मैंने सैकड़ों बार सुना है. सवाल ये नहीं है. सवाल सिर्फ इतना है कि जो लोग जोर जबरदस्ती नगर निगमों या सार्वजनिक जगहों पर दूसरों से वंदे मातरम गवाने पर अमादा हैं, क्या उन्हें वंदे मातरम याद है ? नहीं है तो याद होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए?

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