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एडहॉक शिक्षकों की दास्तान, सरकार कब देगी ध्यान’ – रवीश कुमार के शो प्राइमे टाइम से

अमेरिका में अस्थायी रूप से पढ़ाने वाली एक महिला लेक्चरर की ग़रीबी उसे सेक्स वर्कर की दुनिया में ले गई. बहुत कोशिशों के बाद भी जब ख़र्च के लिए पैसे नहीं जुटे तो वह टूट गई.

क्या आपको पता है कि भारत के तमाम कालेजों, स्कूलों में कितने पद ख़ाली हैं और उनकी जगह ठेके पर पढ़ाने वाले शिक्षकों की आर्थिक और सामाजिक हालत क्या है. क्या आप तमाम नकली मुद्दों के घमासान में अपने उन शिक्षकों की हालत के बारे में ज़रा ठहर कर सोचना चाहेंगे जिन पर आपके बच्चों का भविष्य निर्भर करता है, जिनके न होने से आपका भविष्य ख़राब हुआ है. जो लोग पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के नाम पर ग्रीटिंग कार्ड बांटते हैं और बनाते हैं उन्हें भी आइडिया नहीं कि उस दिवस के योग्य शिक्षकों की हालत क्या है.

ये हालत आज से नहीं है, मगर ये हालत कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी. जिस तरह भारत में ठेके पर शिक्षक रखे जाते हैं, अमरीका में भी वही हालत है. भारत में ठेके पर रखे जाने वाले अस्थायी शिक्षकों को अलग-अलग नाम से बुलाते है. एडहॉक, गेस्ट, कांट्रेक्चुअल, टेम्पररी इन नामों से ये लेक्चरर कालेजों में रखे जाते हैं. अमरीका में इन्हें Adjunct, Indenture कहते हैं. भारत में कॉलेज में पढ़ाने वाले हर किसी को प्रोफेसर ही कहा जाता है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों की बदहाली पर 2013 तक रिपोर्ट आई थी. 30 सितंबर को गार्डियन में एक और भयावह रिपोर्ट छपी है. प्रोफेसरों की ग़रीबी की रिपोर्ट.

अस्थायी रूप से पढ़ाने वाली एक महिला लेक्चरर की ग़रीबी उसे सेक्स वर्कर की दुनिया में ले गई. कोर्स पढ़ाने का लोड कम हुआ तो पैसे और कम हो गए. बहुत कोशिशों के बाद भी जब ख़र्च के लिए पैसे नहीं जुटे तो वह टूट गई. वह क्लास में सबके सामने नाम और चेहरे के साथ पढ़ाती हैं मगर दुनिया को अपनी यह तकलीफ बताने के लिए नाम और चेहरे को छिपाना पड़ता है. नई पीढ़ी को पढ़ाने के लिए, उनके अंदर समझ विकसित करने के लिए उनका कमिटमेंट इतना गहरा है कि वे पढ़ाने के काम से ख़ुद को अलग नहीं कर पाती हैं. वैसे हर किसी को दूसरा कुछ और काम इतनी आसानी से मिलता भी नहीं.

हो सकता है सेक्स वर्कर की दुनिया में किसी लेक्चरर के जाने का किस्सा अपवाद भर हो, मगर सब कुछ अपवाद नहीं है. यह सही है कि वहां अस्थायी या ठेके पर पढ़ाने वाले प्रोफेसर अगर एक कमाई के दम पर सम्मानजनक जीवन नहीं जी पाते हैं. अब तो कई साल से प्रोफेसरों की ग़रीबी पर रिपोर्ट लिखी जा रही हैं और सर्वे किए जा रहे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के कॉलेजों में 60 से 70 फीसदी प्रोफेसर अब ठेके पर रखे जाते हैं. कोर्स पढ़ाने के हिसाब से सैलरी मिलती है जो बहुत कम होती है.

हालत ये है कि बहुत से प्रोफेसर बेघर हैं, किराये के छोटे से मकान में रहते हैं. कुछ फुटपाथ पर रहते हैं और कुछ ने कार को ही अपना घर बना लिया है. भोजन और इलाज के लिए सरकारी सब्सिडी की योजना पर निर्भर रहते हैं. चर्च में जाकर खाना खाते हैं और फिर क्लास में पढ़ाते हैं. हफ्ते में 60-60 घंटे पढ़ाते हैं, फिर भी कमाई पूरी नहीं होती है. क्लास से निकलकर ओला-उबर की टैक्सियां चलाते हैं.

वहां के शिक्षकों के पास खाने की आर्थिक शक्ति नहीं होती, तो वे मांस के खुरचन, चिकन की हड्डियां और संतरे के छिलके से खाना तैयार करने की रेसिपी रखते हैं. अस्थायी शिक्षकों की गरीबी की दुनिया में खाना बनाने की रेसिपी भी अलग है. वहां के भी टीचर यहां के टीचर की तरह अपने हालात के बारे में नहीं बताते हैं. कुछ साल पहले जब वहां की एक अस्थायी टीचर ने दुनिया को बताया कि वे बेघर हैं, सड़क पर रही हैं और न्यूयार्क के शिक्षा विभाग के सामने प्रदर्शन करने लगीं तब जाकर हेडलाइन बनी. लोगों का ध्यान इस ओर गया.

1990 से 2009 के बीच ठेके पर रखे जाने वाले प्रोफेसरों की संख्या बढ़ी है. अमेरिका में शिक्षा पर बजट लगातार काम होता जा रहा है. कॉलेजों में परमानेंट की जगह ठेके के शिक्षकों से काम चलाया जाता है. ठेके के शिक्षकों को भी अब काम कम दिया जाता है ताकि बजट बच सके. ठेके के शिक्षक काफी सस्ते होते हैं. उन्हें रिसर्च के फंड और अन्य सुविधाएं भी नहीं देनी होती है. चालाकी से उनकी पढ़ाई का समय कम कर दिया जाता है ताकि वे स्वास्थ्य बीमा के योग्य न हो सकें.

गार्डियन की रिपोर्ट में एक टीचर ने बताया कि मां की मौत के बाद अगली सुबह आठ बजे क्लास में थी. अस्थायी शिक्षकों को छुट्टियां नहीं मिलती हैं. क्लास से बाहर आई तो पार्किंग में गिर गईं. एक अंग्रेज़ी के अस्थायी प्रोफेसर जेम्स पेन्नी और उनके पति का बयान छापा है. ये दोनों कार में रहते हैं. उसी कार में इनके साथ दो कुत्ते भी रहते हैं. डैशबोर्ड पर कुछ नहीं रखते हैं और न ही फ्लोर पर ताकि किसी को पता न चले कि बेघर हैं. कपड़े संभाल कर पहनते हैं ताकि ग़रीबी बाहर से न दिख जाए. कुछ टीचर तो बहुत ही छोटे से कमरे में रहेत हैं. बीमारी के इलाज में और भी कर्ज़े से दब जाते हैं.

5 सितंबर, 2016 के इंडियन एक्सप्रेस में अपना नाम गुप्त रखते हुए एक एडहॉक लेक्चरर ने राष्ट्रपति को लिखा है कि आप हमारा नाम नहीं जान पाएंगे लेकिन हमारे जैसे लाखो अस्थायी शिक्षक यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं और देश की सेवा कर रहे हैं. किसी भी यूनिवर्सिटी में हमारा ही बहुमत है. हम 20-20 साल से अस्थायी तौर पर पढ़ा रहे हैं. नाम न बताते हुए जनाब ने लिखा है कि 25 साल की उम्र में कोरपोरेट की नौकरी छोड़ पढ़ाने का फैसला किया था. मगर बीस साल से यही देख रहा हूं कि हम सिर्फ अप्रैल से जून के बीच ही यूनिवर्सिटी के सदस्य होते हैं. हर साल वही सर्टिफिकेट की फोटोकॉपी बार-बार जमा करते हैं. अगले सत्र या अगले साल पता नहीं होता कि हम क्या करेंगे. मेडिकल लीव नहीं मिलता, बीमा नहीं मिलता है. नियुक्ति पत्र न होने के कारण किराये का मकान भी कोई नहीं देता है. हम किराया भी ठीक से नहीं चुका पाते हैं.

क्या आपको कभी लगा था कि भारत और अमेरिका के प्रोफसरों के हालात एकसमान होंगे. देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का न तो डेटा है और न ही सरकारें इस तरह के डेटा आपको देती हैं. सोचिए लाखों अस्थायी शिक्षक 20-20 साल से पढ़ा रहे हैं. आधी सैलरी पर वो देश का कितना बड़ा काम कर रहे हैं. बेरोज़गारी भारत के युवाओं पर ज़बरन थोपी जा रही है. ये शिक्षक अपना नाम और चेहरा नहीं दिखा सकते हैं. अगर हम इनके घरों में झांकर देखें तो क्या हम समझ सकते हैं कि 10-10 साल से न्यूनतम या आधी सैलरी पर पढ़ाने वाले इन शिक्षकों की आर्थिक स्थिति कैसे होती है.

ज़्यादातर एडहॉक टीचर यूनिवर्सिटी के आस-पास के सामान्य इलाके में रहते हैं. संतनगर, बुराड़ी, वज़ीराबाद, विजय नगर में रहते हैं. बहुत कम के पास दो कमरों का घर होता है. ज़्यादातर पेइंग गेस्ट बनकर रहते हैं जिसका किराया पांच से सात हज़ार रुपये प्रति माह होता होगा. अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में परमानेंट कितने हैं, एडहॉक कितने हैं और गेस्ट कितने हैं, इसकी आधिकारिक संख्या यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर नहीं मिली जो कि होनी चाहिए थी. मगर एडहॉक शिक्षकों के लिए लड़ने वाले बताते हैं कि कुल दस हज़ार लेक्चरर होंगे जिसमें से करीब पांच हज़ार एडहॉक और 15 सौ के करीब गेस्ट टीचर होंगे. एडहॉक को 60,000 के करीब सैलरी मिलती है मगर वो भी चार महीने के लिए. गेस्ट को हर लेक्चर के एक हज़ार मिलता है, उसे महीने में पच्चीस हज़ार से अधिक नहीं मिल सकता है. दिल्ली जैसे शहर में आप क्लास में टीचर बनकर खड़े होते हैं मगर 25,000 की कमाई आपको झुग्गियों के वन रूम सेट में पटक देती है. एडहॉक को चार महीने में सिर्फ चार छुट्टियां मिलती हैं. ऐसे बहुत से किस्से हैं कि मेटरनिटी लीव के समय नौकरी छोड़नी पड़ गई.

नैक की कमेटी आती है तो कालेज की मान्यता के लिए रात-रात भर एडहॉक ही काम करते हैं. कॉलेज में प्रिंसिपल और विभाग के अध्यक्ष के बदलते ही समीकरण बदलता है और वे रोड पर आ जाते हैं. आज-कल एडहॉक वाले किसी तरह आरएसएस के लोगों का पता खोज रहे हैं, पहले वे सीपीएम के लोगों का पता खोजते थे कि किसी तरह परमानेंट हो जाएं. मगर सारे शिक्षक इसी के भरोसे यहां नहीं हैं. उनकी प्रतिभा पर कोई उंगली नहीं उठा सकता मगर राजनीति ने कोई परमानेंट भी नहीं होने दिया है. डिपार्टमेंट हेड का ईगो भी तय करता है कि आपका परमानेंट होगा या नहीं.

आइये, आपको इस अंधेरे रास्ते से आपको दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे एक अस्थाई टीचर के घर ले चल रहा हूं. आदमी और हवाओं के अंदर आने के लिए एक दरवाज़ा ही है बस. खिड़की नहीं है. जितना दिख रहा है उतना ही संसार है इस टीचर का. दीवारों के साथ किताबें खड़ी हैं. इतनी किताबें देखकर लगता है कि यह टीचर पढ़ाता नहीं होगा या पढ़कर क्लास में नहीं जाता होगा. कुर्सियों की हालत ऐसी है जैसे भारत की ग़रीबी रेखा इसी पर आराम फरमाती हो.

एक साल से एडहॉक पढ़ाने वाले टीचर का यह कमरा है. इस कमरे का किराया साढ़े तीन हज़ार है. सैलरी 60,000 मिलती है मगर अगले महीने मिलेगी या नहीं पता नहीं. चार महीने के बाद कितने महीने तक नहीं मिलेगी पता नहीं. इसलिए पैसा संभल कर ख़र्च करते हैं. पांच कमरों पर यही एक शौचालय है. ऐसी जगहों पर अंधेरे में ही जाना ठीक होता है. इस कमरे से निकल जब यह मास्टर क्लास में पहुंचता होगा तो पचासों छात्रों की उम्मीद बन जाता होगा.

हम एडहॉक शिक्षकों के मसले को यूनिवर्सिटी की सफाई, प्रक्रिया और बजट की कमी जैसे चतुर बहानों के कारण नहीं समझ पाते हैं. दिल्ली विश्वविद्लाय में हर साल लाखों छात्र सपना लेकर यहां आते हैं कि 98 फीसदी पर एडमिशन देने वाले डीयू के शिक्षक उसके सपनों को साकार कर देंगे.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के इस वन रूम सेट में आठ साल से एडहॉक पढ़ा रहे एक प्रोफेसर रहते हैं. कमरा थोड़ा बड़ा है और साफ-सुथरा भी है लेकिन इस बस्ती में इसलिए रहते हैं क्योंकि यहां साढ़े सात हज़ार रुपये में वन रूम सेट मिल जाता है जो अगले महीने से 8,000 का होने वाला है. हर लेक्चर के लिए 3-3 घंटे पढ़ने वाले ये प्रोफेसर जब 50 छात्रों के बीच पहुंचते हैं तो उन्हें लगता है कि सिर्फ टीचर नहीं आया है, उनके बीच एक आदर्श भी आया है जिसका काम राष्ट्र का निर्माण करना है. हर नेता बोल कर चला जाता है कि शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं, यह नहीं बोलेगा कि राष्ट्र निर्माता फिर ऐसी हालत में क्यों हैं. इस कमरे में रहने वाले ने बताया कि बदबूदार पानी से नहाकर हमेशा तरोताज़ा भी दिखना है. 60,000 की कमाई कब खत्म हो जाएगी पता नहीं, बहनों की शादी की ज़िम्मेदारी है, अपनी शादी भी नहीं की. आठ साल से एक ही कालेज में एडहॉक पढ़ा रहे हैं. इसका मतलब है उस कालेज में जगह है तो फिर परमानेंट क्यों नहीं होता है. इस कमरे में हिन्दी साहित्य की हर बेहतरीन किताब है, ज्ञान का भंडार है, जो रहता है उसने दो किताबें भी लिख ली हैं मगर नौकरी पक्की नहीं हुई है. पता भी नहीं होता कि अगले सेमेस्टर पर किस कालेज में रहेंगे, छात्रों से जो संबंध बनता है वो टूट जाता है, शिक्षक की चिंता मत कीजिए, छात्रों की ही सोचिए, वो जिस शिक्षक पर भरोसा करते हैं वो अगले सेमेस्टर में गायब हो जाता है. वन रूम सेट की दुनिया में चला जाता है. एक कमरे की क्लास, एक कमरे का जीवन. शादी की नहीं है और कर नहीं सकते.

दिल्ली विश्वविद्यालय में जितने पद खाली हैं उन्हें भरना शुरू हो तो भी सारे पद भरने में दो साल से ज़्यादा का वक्त लग जाएगा वो भी तब जब रोज़ यह काम हो. टीचर कहते हैं उनमें जज़्बा है पढ़ाने को लेकर. दिल्ली विश्वविद्लाय में यह हो नहीं सकता कि क्लास में टीचर न हो. एडहॉक को होना ही पड़ता है और परमानेंट भी क्लास लेते हैं. छुट्टियों को लेकर दर्दनाक कहानियां हैं. माता-पिता की तबीयत खराब है, किसी मित्र को क्लास देकर जाना होता है. अपनी और दोस्तों की शादी में नहीं जा पाते हैं.

चूंकि हिन्दू-मुस्लिम विषय और सियासी प्रोपेगैंडा से मीडिया का स्पेस इतना भरा हुआ है कि आपके ज़िले के कॉलेज और राज्य की यूनिवर्सिटी का हाल सामने नहीं आ पाता और लोगों को भी कम ही मतलब होता है.

हमारे सहयोगी अनुराग द्वारी ने मध्य प्रदेश के चंबल इलाके के कालेजों में पढ़ाने वाले कुछ शिक्षकों से बात की. एक शिक्षक के साथ उनके कॉलेज भी गए. मुरैना का पीजी एक्सलेंस कालेज है, यहां 1100 छात्र पढ़ते हैं. जूलोजी के प्रोफेसर हैं. 2002 में पीएचडी पूरी करने के बाद से इसी कालेज में पढ़ा रहे हैं. 15 साल हो गए मगर पक्की नहीं हुई है. परमानेंट नहीं हुए. इनके जैसे शिक्षकों को अतिथि विद्वान कहा जाता है. नाम तो बड़ा संस्कारी लगता है मगर इनका वेतन सुनेंगे तो टीवी बंद कर देंगे. एक कॉलेज के प्रोफेसर को 7-8 हज़ार रुपए महीना मिलता है जबकि तीन साल में 150 से अधिक छात्रों को पढ़ाते हैं. आप सोचिए इतनी कम कमाई में ये चाह कर अपने विषय की एक किताब तक नहीं ख़रीद सकते. आपके बच्चों को क्या पढ़ाएंगे. गवर्मेंट पीजी कालेज में 38 पद सृजित हैं. 23 परमानेंट हैं और 15 अस्थायी हैं.

मध्य प्रदेश की जबलपुर हाईकोर्ट के डबल बेंच ने 14 सितंबर, 2017 को एक आदेश दिया है. अभी तक सरकार यह कर रही थी कि अस्थायी शिक्षक को कुछ समय बाद वहां से हटा दे रही थी. उसकी जगह दूसरा अस्थायी शिक्षक रख ले रही थी. अदालत ने कहा कि इनकी जगह दूसरा जो आएगा वो परमानेंट होगा. अस्थायी की जगह अस्थायी नहीं आएगा. अस्थायी, कांट्रेक्चुअल को आप अतिथि विद्वान कह लीजिए मगर सबको पता है सम्मान के नाम पर शिक्षकों के शोषण का नाम बदला जा रहा है. राज्य के उच्च शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर कुछ आंकड़े इस तरह हैं- मध्य प्रदेश के सरकारी कालेजों में 7677 शिक्षकों के पद हैं. मात्र 2638 शिक्षक ही स्थाई हैं. पांच हज़ार से ज़्यादा शिक्षक अतिथि विद्वान बनकर पढ़ा रहे हैं.

जब पद ख़ाली हैं तो परमानेंट भरती क्यों नहीं. अतिथि विद्वानों का रेट भी वेबसाइट पर दिया गया है. पता चला कि अतिथि विद्वान के भी कई प्रकार हैं. उनके अलग-अलग नाम हैं-

अतिथि विद्वान प्राध्यापक- 825 रुपये प्रति कार्यदिवस
अतिथि विद्वान क्रीड़ाधारी- 580 रुपये कार्यदिवस
अतिथि विद्वान ग्रंथपाल- 580 रुपये प्रति कार्यदिवस
अतिथि विद्वान/शिक्षक, संस्कृत महाविद्यालय- 390 रुपये प्रति कार्यदिवस
अतिथि विद्वान शिक्षक स्नातक, संस्कृत- 290 रुपये प्रति कार्यदिवस
अतिथि विद्वान सहायक व्याख्याता, संस्कृत- 275 रुपये प्रति कार्यदिवस

आप देखिए कि क्या हाल है उच्च शिक्षा का है. नाम उच्च शिक्षा का है और मेहनताना निम्न स्तर का. सरकारें संस्कृत के नाम पर इतना नाटक करती हैं, संस्कृत के अतिथि विद्वानों का रेट यानी मेहनताना सबसे कम है. 275 रुपये. न्यूनतम मज़दूरी से मात्र एक रुपया अधिक. अपने गुरुओं को नौकरी दिए बग़ैर भारत मेक इन इंडिया की किस फैक्ट्री में विश्व गुरु बन रहा है.

स्मिता सुखवाल मध्य प्रदेश के आगर मालवा के एक कालेज नेहरू महाविद्यालय में अतिथि विद्वान हैं. 1966 में इस कॉलेज की स्थापना हुई थी. इस कॉलेज में मंज़ूर पदों की संख्या 32 है मगर मात्र 5 ही परमानेंट हैं. यहां पर 27 शिक्षक अतिथि विद्वान हैं. यानी पूरा कालेज अतिथि विद्वानों के दम पर चल रहा है. एक ने कहा कि जब नौकरी नहीं दे सकते हैं तो यूजीसी हर साल नेट की परीक्षा क्यों लेती है. पंजाब में भी हाल बुरा है. यहां के स्कूल-कॉलेजों में भी बड़ी संख्या में पद खाली हैं. यहां के शिक्षक संघ की राजनीति से जुड़े प्रो. जयपाल सिंह ने बताया कि पंजाब में 2007 के बाद से नियमित टीचर की भर्ती नहीं हुई है, उस समय सिर्फ अंग्रेज़ी में हुई थी. बाकी सब्जेक्ट में आखिरी बार 1996 में भर्ती हुई थी. पंजाब में गेस्ट फैकल्टी का भी बुरा हाल है. इनकी सैलरी 21,600 से अधिक नहीं हो सकती है. लेकिन आधी से कम सैलरी सरकार देती है, आधी से ज़्यादा छात्र एडमिशन के समय देते हैं. तीन साल पहले एक सर्कुलर आया कि सरकार 10,000 रुपये ही देगी. बाकी पैसा पैरेंट-टीचर एसोसिएशन की तरफ से दिया जाएगा. पीटीए की तरफ से 11,600 रुपया एडमिशन के समय जमा किया जाता है.

पंजाब में एक और नई श्रेणी है. इस तीसरी कैटगरी को सेल्फ फाइनेंस टीचर. ये जिस जगह पर पढ़ाते हैं, वो सरकार परमानेंट टीचर नियुक्त ही नहीं करती है. आपने सेल्फ फाइनेंस कालेज सुना होगा, स्कूल सुना होगा, क्या सेल्फ फाइनेंस टीचर सुना था. करीब 200 से ज्यादा शिक्षक इस कैटगरी के तहत पढ़ा रहे हैं. इन्हें सेल्फ फाइनेंस कोर्स के लिए रखा जाता है. बीबीए, एमसीए, हॉस्पिटालिटि मैनेजमेंट टाइप इसमें आते हैं. बच्चे ही इनकी सैलरी एडमिशन के समय देते हैं. सरकार इनके लिए एक भी पैसा नहीं देती है.

पटियाला का एक मशहूर बीएड ट्रेनिंग स्कूल है. 1955 में इसकी स्थापना हुई थी, इसके उदघाटन के लिए गृहमंत्री जीबी पंत गए थे. 200 एकड़ ज़मीन में यह संस्थान बना है. कभी यह पंजाब का नंबर वन संस्थान था जहां से पढ़कर लोग टीचर बनते थे. अब शिक्षकों को ट्रेनिंग देने वाले इस कॉलेज में दस विषय ऐसे हैं जिसके लिए एक भी परमानेंट टीचर नहीं है. गेस्ट टीचर से काम चल रहा है.

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